Class 12 Economics II Chapter 3 मुद्रा और बैंकिंग

NCERT Solutions for Class 12 Economics Chapter 3

(मुद्रा और बैंकिंग)

प्र० 1. वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है? इसकी क्या कमियाँ हैं?
उत्तर: जब एक वस्तु का विनिमय प्रत्यक्ष रूप में दूसरी वस्तु से होता है तो उसे वस्तु विनिमय कहा जाता है। अन्य शब्दों में, वस्तु विनिमय प्रणाली उस प्रणाली को कहा जाता है जिसमें वस्तु का लेन-देन वस्तु से किया जाता है।
वस्तु विनिमय प्रणाली की निम्नलिखित कमियाँ हैं
1. आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव-वस्तु विनिमय के लिए आवश्यक है कि एक व्यक्ति की आवश्यकता की वस्तु दूसरे व्यक्ति के पास हो और जो वस्तु दूसरा व्यक्ति चाहता है, वह पहले के पास हो। दूसरे शब्दों में, पहले व्यक्ति की वस्तु की पूर्ति, दूसरे की माँग की वस्तु हो और दूसरे व्यक्ति की। पूर्ति की वस्तु, पहले व्यक्ति के माँग की वस्तु हो। जब तक आवश्यकताओं को इस प्रकार का दोहरा संयोग नहीं होता, वस्तु की लेन-देन नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए यदि किसी के पास जूता है, परन्तु वह उसके बदले में गेहूँ तैयार नहीं तो विनिमय संभव नहीं है।
2. सामान्य लेखा इकाई का अभाव-वस्तु विनिमय प्रणाली में भिन्न-भिन्न वस्तुओं का मूल्य जानने के लिए और तुलना करने के लिए कोई सर्वमान्य मापक नहीं है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति गेहूँ का
लेन-देन करना चाहता है तो उसे गेहूं का मूल्य कपड़े के रूप में (1 किलो गेहूँ = 1 मीटर कपड़ा), दूध के रूप में (1 किलो गेहूँ = 2 लीटर दूध) आदि बाजार में उपलब्ध हर वस्तु के रूप में पता होना चाहिए।
यह अत्यन्त कठिन कार्य है।
3. स्थगित भुगतान के मानक का अभाव-वस्तु विनिमय व्यवस्था में वस्तुओं का भविष्य में भुगतान करने में कठिनाई होती है। इस प्रणाली में ऐसी कोई इकाई नहीं होती जिसे स्थगित/भविष्य भुगतान के मानक के रूप में प्रयोग कर सकें। वस्तुओं के रूप में भावी भुगतानों का वस्तुओं के रूप में भुगतान किया जाए तो इसमें कई कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। जैसे भविष्य में दी जानेवाली वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर विवाद, भविष्य में भुगतान की वस्तु पर असहमति, अनुबंध की अवधि के दौरान वस्तु के अपने मूल्यमान में उतार-चढ़ाव का जोखिम जिससे एक को लाभ तथा दूसरे को हानि होने की संभावना रहती है। उदाहरण के लिए कीमत X ने 10 वर्ष के लिए अपना रथ श्रीमान Y को दिया। 10 वर्ष बाद वह वही रथ नहीं लौटा सकता, क्योंकि वे पुराने हो गए। यदि वह नया रथ लौटाता है तो गुणवत्ता पहले वाले रथ
से अधिक भी हो सकती है और कम भी।
4. मूल्य संचय का अभाव-यहाँ मूल्य को संचय वस्तुओं के रूप में हो सकता है, परन्तु मूल्य को वस्तुओं के रूप में संचित करने में निम्नलिखित कठिनाइयाँ हैं|
(i) मूल्य को वस्तुओं के रूप में संचित करने में अधिक स्थान की आवश्यकता पड़ती है।
(ii) वस्तुएँ नाशवान होती हैं।
(iii) वस्तुओं के मूल्य में अंतर आ जाता है।
(iv) वस्तुओं को रखे हुए भी मूल्यहास होता है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति अपनी बेटी के विवाह के लिए मूल्य का संचय करना चाहता है तो वह क्या संचय करेगा? क्या वह बारातियों का भोजन
बनवाकर रख देगा? क्या वह फर्नीचर खरीदकर रख देगा?
5. अन्य कठिनाइयाँ-
(i) वस्तु विनिमय में ऐसी वस्तुओं के लेन-देन में बहुत कठिनाई आती है जिसका
विभाजन और उपविभाजन नहीं हो सकता। मान लो 1 बैल = 100 किलो गेहूँ परन्तु बैल का मालिक केवल 50 किलो गेहूं खरीदना चाहता है तो वह आधा बैल नहीं दे सकता।
(ii) वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत यदि कोई व्यक्ति एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर जाना चाहता है तो वह अपने धन को दूसरे स्थान पर ले जाने में असमर्थ हो सकता है। जैसे कोई अपने खेत एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं ले जा सकता।

प्र० 2. मुद्रा के प्रमुख कार्य क्या-क्या हैं? मुद्रा किस प्रकार वस्तु विनिमय प्रणाली की कमियों को दूर करता है?
उत्तर: मुद्रा के हैं कार्य चार – माध्यम, मापक, मानक, भण्डार”
मुद्रा के प्रमुख कार्यों को दो भागों में बाँटा जा सकता है।
1. प्राथमिक कार्य ।
2. गौण कार्य

1. विनिमय का माध्यम-यह मुद्रा का सर्वप्रथम और सर्वमहत्वपूर्ण कार्य है। मुद्रा के इस कार्य ने क्रय और विक्रय की इस क्रिया को एक दूसरे से भिन्न कर दिया है। आज का समय सभी अर्थव्यवस्थाएँ मौद्रिक अर्थव्यवस्थाएँ हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली के सबसे बड़ी कमी दोहरे संयोग का अभाव है। इसे मुद्रा के इस कार्य से दूर कर दिया हैं अब यदि एक वस्त्रों का विक्रेता चावल खरीदना चाहता है तो उसे ऐसा चावल विक्रेता ढूंढने की आवश्यकता नहीं है जो बदले में वस्त्र चाहता है। वह वस्त्र बेचकर मुद्रा प्राप्त कर सकता है। और उस प्राप्त मुद्रा से चावल खरीद सकता है। अतः मुद्रा से दोहरे संयोग के अभाव की कमी स्वतः दूर हो जाती है। मुद्रा के इसी कार्य के कारण मुद्रा को सामान्यकृत क्रय शक्ति कहा जाता है।
2. मूल्य की इकाई-मुद्रा का ‘लेखा की इकाई’ कार्य को मूल्यमान का मापक भी कहा जाता है। मुद्रा के इस कार्य को अर्थ है कि जिस प्रकार प्रत्येक चर को मापने की एक इकाई होती है वजन को किलो में, कद को सेमी. में, दूरी को किमी. में इसी प्रकार किसी वस्तु के मूल्य को मुद्रा में मापा जाता है। अतः मुद्रा मूल्य की मापक इकाई का कार्य करती है। यदि कोई पूछे कि इस पर्स का क्या मूल्य है। तो हम यह नहीं कहेंगे कि एक पर्स बराबर 5 किलो चावल या 10 पेन बल्कि हम मौद्रिक रूप में उसका मूल्य बतायेंगे। अतः मुद्रा लेखा की इकाई कार्य करती है। वस्तु विनिमय प्रणाली में सामान्य मूल्य मापक ‘या लेखा की इकाई का अभाव या जिसे मुद्रा के इस कार्य ने दूर कर दिया।
3. स्थगित भुगतान का मान–आस्थगित भुगतान वे भुगतान होते हैं जो भविष्य में किसी समय भुगतान किये जाते हैं। क्योंकि मुद्रा का अपना मूल्य अर्थात् उसकी क्रय शक्ति सामान्यतः अपरिवर्ती रहती है। एक आधुनिक अर्थव्यवस्था में व्यावहारिक लेन-देन में साख और उधार का बहुत महत्व रहता है। आस्थागित भुगतान या भविष्य भुगतान मुद्रा में ही संभव होते हैं क्योंकि एक तो मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है और इससे मुद्रा का विनिमय का माध्यम कार्य उसे सामान्यकृत क्रयशक्ति प्रदान करता है। मुद्रा का प्रयोग भविष्य भुगतानों से संबंधित खतरे को भी कम कर देती है। आज के समय में मुद्रा के कारण ही इतने दीघकालीन
समझौते हो पाते हैं।
4. मूल्य का संचय-जब कोई व्यक्ति अपनी भविष्य की आवश्यकताओं के लिए मूल्य का संचय’ करना चाहता है तो वह केवल मुद्रा के रूप में ही कर सकता है। इसके कारण इस प्रकार हैं:
(i) मुद्रा की क्रय शक्ति अन्य वस्तुओं की तुलना में अपरिवर्तित रहती है।
(ii) मुद्रा को कीड़ा दीमक आदि नहीं लगता अर्थात् मुद्रा रखे हुए नष्ट नहीं होती।
(iii) मुद्रा का संचय करने में बहुत कम स्थान की आवश्यकता पड़ती है।
(iv) मुद्रा को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर या एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को भेजा जा सकता है मान लो कोई व्यक्ति अपनी बेटी की शादी के लिए अभी से कुछ बचत करना चाहते हैं तो क्या वे अभी से भोजन बनवा सकते हैं या वे अभी से वस्त्र खरीदकर रख सकते हैं? नहीं वे मुद्रा के रूप में अपने भविष्य की आवश्यकताओं के लिए मूल्य का संचय कर सकते हैं।
5. मूल्य का हस्तांतरण-मुद्रा के कारक मूल्य का हस्तांतरण आसान हो गया है। यदि किसी व्यक्ति को भारत से कनाडा में मूल्य का हस्तांतरण करना है तो मुद्रा के माध्यम से यह बहुत सहज हो गया है। बैंक मुद्रा इसमें और अधिक सहायक है। मुद्रा के इसी कार्य के कारण आज संपूर्ण विश्व एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तरह लेन-देन कर पा रहा है।
मुद्रा के प्रत्येक कार्य विनिमय प्रणाली की एक कमी को दूर कर रहा हैविनिमय प्रणाली की कमी मुद्रा का वह कार्य जो इस कमी को दूर कर रहा है।

इस प्रकार मुद्रा का प्रत्येक कार्य वस्तु विनिमय प्रणाली की एक कमी को दूर कर रहा है।

प्र० 3. संव्यवहार के लिए मुद्रा की माँग क्या है? किसी निर्धारित समयावधि में संव्यवहार मूल्य से यह किसी प्रकार संबंधित है?
उत्तर: मुद्रा की माँग संव्यवहार को पूरा करने के उद्देश्य से की जाती है तो इसे संव्यवहार के लिए मुद्रा की माँग कहा जाता है। अन्य शब्दों में यह गृहस्थों तथा फर्मों द्वारा अपने दिन-प्रतिदिन के लेन-देन के कार्यों के लिए की गई मुद्रा की माँग है। सौदों के लिए नकदी संचय की माँग इसीलिए होती है, क्योंकि मुद्रा की प्राप्ति और उसके व्यय में समय का अन्तर होता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आये मासिक आधार पर प्राप्त करता है और मास के पहले दिन बिल का भुगतान करते हैं, तो हमें पूरे मास नकद राशि धारण करने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु ऐसा नहीं है लोग अलग-अलग समय पर आय प्राप्त करते हैं। उनका व्यय उस पूरे समयांतराल में लगातार होता रहता है। व्यक्ति एवं फर्मे कितनी मात्रा में नकदी का संचय करना चाहेंगे यह सौदों की कुल मात्रा पर निर्भर करता है। अर्थव्यवस्था में कुल सौदों की मात्रा राष्ट्रीय आय पर निर्भर करती है। सूत्र के रूप में


अतः किसी अर्थव्यवस्था में संव्यवहार के लिए मुद्रा की माँग का अर्थव्यवस्था की वास्तविक आय और उसके औसत कीमत स्तर के बीच धनात्मक संबंध होता है।

प्र० 4. मान लीजिए कि एक बंधपत्र दो वर्षों बाद 500 ₹ के वादे का वहन करता है, तत्काल कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं
होता है। यदि ब्याज दर 5% वार्षिक है, तो बंधपत्र की कीमत क्या होगी?

उत्तर:


प्र० 5. मुद्रा की सट्टा माँग और ब्याज की दर में विलोम संबंध क्यों होता है?
उत्तर: जब हम मुद्रा को सट्टा माँग के उद्देश्य से अपने पास रखते हैं तो मुद्रा को नकदी रूप में अपने पास रखने की अवसर लागत ब्याज दर है। यदि हम 5000 बैंक में रखें और यह हमें 10% प्रति वर्ष ब्याज देता है तो इस 5000 को अपने पास नकदी के रूप में रखने की अवसर लागत १ 500 है, परन्तु यदि ब्याज दर कम होकर 5% हो जाए तो अवसर लागत भी कम होकर ₹ 250 हो जायेगी।
अतः ब्याज की दर अधिक तो नकदी रखने की अवसर लागत अधिक और तदनुसार मुद्रा की सट्टा माँग कम होगी और विपरीत।। इसे अन्य शब्दों में भी समझा जा सकता है। एक व्यक्ति के पास दो विकल्प हैं एक वह अपने पास उपलब्ध नकद मुद्रा को बान्ड में निवेश कर दे और दूसरा वह उसे सट्टा उद्देश्य के लिए अपने पास रखे। यदि वह नकदी को सट्टा उद्देश्य के लिए अपने पास रखता है तो उसे वह आय छोड़नी होगी, जो वह इसे बॉण्ड में निवेश करके ब्याज के रूप में प्राप्त कर सकता है। इसे हम नकदी रखने की कीमत कह सकते हैं। माँग के नियम
के अनुसार, कीमत बढ़ने पर माँगी गई मात्रा कम होती है तथा विपरीत अतः ब्याज दर बढ़ने पर सट्टा उद्देश्य के लिए माँगी गई मुद्रा की मात्रा में कमी होगी तथा विपरीत। अतः मुद्रा की सट्टा माँग और ब्याज दर में विपरीत संबंध है।

प्र० 6. तरलता पाश क्या है?
उत्तर: तरलता पाश एक ऐसी स्थिति है जिसमें ब्याज की दर अति निम्न होती है और हर निवेशक भविष्य में ब्याज दर में वृद्धि की आशा रखता है। परिणामस्वरूप निवेशकों को बॉण्ड में निवेश करना आकर्षक नहीं लगता। ऐसी हालत में लोग बॉण्डस बेचकर मुद्रा अपने पास इकट्ठी करते जाते ? हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में बॉण्डस ऐसी परिसंपत्ति ना के बराबर आय 7प्रदान करती है। इससे मुद्रा के लिए सट्टेबाजी की माँग अनंत या पूर्ण लोचदार हो जाती है। इसे नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है। ब्याज दर = 2% के बाद मुद्रा माँग वक्र X-अक्ष के समान्तर हो E4 गया है। इस स्थिति को तरलता पाश या तरलता फंदा कहा जाता
तरलता पाश है। यह स्थिति मौद्रिक अधिकारियों के लिए एक कठिन चुनौती है। क्योंकि इस स्थिति में मौद्रिक नीति द्वारा भी साख व मुद्रा की पूर्ति । को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।


प्र० 7. भारत में मुद्रा पूर्ति की वैकल्पिक परिभाषा क्या है?
उत्तर: भारत में मुद्रा की पूर्ति की भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा चार वैकल्पिक परिभाषाएँ दी गई हैं नामतः M1, M2, M3 और M4 जो इस प्रकार हैं।
M1 = C + DD + OD
M2 = M1 + डाकघर बचत बैंकों में बचत जमाएँ।
M3 = M1 + वाणिज्यिक बैंकों की निवल आवधिक जमाएँ
M4 = M3 + डाकघर बचत संस्थाओं में कुल जमाएँ (राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्रों को छोड़कर)
जहाँ, C = जनता के पास करेंसी
DD = माँग जमाएँ।
OD = रिजर्व बैंक के पास अन्य जमाएँ
इसे M1 को संकुचित मुद्रा तथा M3 को व्यापक मुद्रा कहा जाता है?

प्र० 8. वैधानिक पत्र क्या है? कागजी मुद्रा क्या है?
उत्तर: वैधानिक पत्र अथवा वैधानिक मुद्रा – इससे तात्पर्य उस मुद्रा से है जिसे कानून का समर्थन प्राप्त है और कोई भी व्यक्ति इसे अस्वीकार नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, भारत की घरेलू सीमा के भीतर कोई भी व्यक्ति किसी प्रकार के लेन-देन के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किये गए 100 ₹ या उससे अधिक के नोटों को लेने से इंकार नहीं कर सकता।
कागजी मुद्रा – इससे तात्पर्य भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी करेंसी नोट और सिक्कों से हैं इसका सोने और चाँदी के सिक्कों की तरह कोई आंतरिक मूल्य नहीं होता और यह सरकार के आदेश पर प्रचलित होती है। इस मुद्रा को आदेश मुद्रा भी कहा जाता है।

प्र० 9. उच्च शक्तिशाली मुद्रा क्या है?
उत्तर: उच्च शक्तिशाली मुद्रा से तात्पर्य देश के मौद्रिक प्राधिकरण द्वारा निगमित की गई मुद्रा से है, इसे मौद्रिक आधार
के नाम से भी जाना जाता है। उच्च शक्तिशाली मुद्रा में करेंसी तथा व्यावसायिक बैंक के पास माँग जमाएँ तथा भारतीय रिजर्व बैंक के पास रखी अन्य जमाएँ शामिल की जाती हैं। यह भारतीय रिजर्व बैंक की देश की मौद्रिक प्राधिकरण की संपूर्ण देयता को दिखाता है। यदि कोई आम जनता भारतीय रिजर्व बैंक को करेंसी नोट प्रस्तुत करता है, तो रिजर्व बैंक को उस मुद्रा के मूल्य पर अंकित मूल्य की राशि के बराबर का भुगतान करना होता है। इसी तरह भारतीय रिजर्व बैंक में जमा की गई राशि भी लौटाए जाने योग्य होती है, जब जमाधारी इसकी माँग करते हैं।

प्र० 10. व्यावसायिक बैंक के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: व्यावसायिक बैंक के कार्य-बैंकों के दो सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य हैं-जमा स्वीकार करना और ऋण देना।
1. जमा स्वीकार करना-बैंक लोगों की बचतों को जमा करता है। बैंकों के साथ हम तीन प्रकार के खाते खोल सकते हैं-
(i) बचत खाता
(ii) चालू खाता
(iii) सावधि खाता
(i) बचत खाता – यह खाता छोटी-छोटी बचतों को प्रोत्साहित करने के लिए होता है। यह परिवारों के लिए लाभदायक है, जिनको एक बार रुपया जमा करवाने के बाद तुरंत ज़रूरत नहीं पड़ती है। एक निश्चित सीमा तक ही रकम को इस खाते से हम निकलवा सकते हैं। इसमें ब्याज की दर सावधि जमा से कम होती है।
(ii) चालू खाता – यह ऐसी जमा होती है जिनका भुगतान बैंको को खाताधारियों की माँग पर तत्काल करना होता है इस खाते में जमा राशियाँ, माँग जमा कहलाती हैं, क्योंकि माँगने पर कभी भी निकलवा सकते हैं। यह खाता व्यापारी लोगों के लिए उपयोगी होता है, जिनको दिन में कई बार रुपया निकलवाने की जरूरत पड़ती है। चूंकि बैंक को इस खाते का पैसा सदा तैयार रखना पड़ता है, इसलिए इस खाते में बैंक ब्याज नहीं देता, बल्कि उनसे कुछ-न-कुछ लेता है। चेक द्वारा पैसा निकालने की सुविधा उपलब्ध रहती है।
(iii) सावधि खाता-सावधि जमा वह होती है जिसकी परिपक्वता की अवधि निर्धारित होती है। इसमें दीर्घ व निश्चित काल के लिए जमा स्वीकार की जाती है, इसलिए इस खाते में ब्याज की रकम अधिक होती है। यह निश्चित अवधि के लिए होता है और समय पूरा होने पर ही इसे निकलवा सकते हैं इससे पहले नहीं। इसमें चेक की सुविधा नहीं होती। यह बहुत ही धनी लोगों के लिए लाभकारी है, जिनको कभी रुपए की जरूरत नहीं होती। मियादी जमा की एक किस्म आवती जमा भी है जिसमें खाता धारक एक निश्चित अवधि तक हर महीन निश्चित राशि जमा करता है। जैसे-3 वर्षों तक 100 ₹ प्रति मास जमा करना। इसे मुद्रा की पूर्ति में शामिल नहीं किया जाता।।
2. ऋण देना-बैंक का दूसरा मुख्य कार्य ग्राहकों को ऋण देना है। बैंक दूसरे लोगों से जमा स्वीकार करता है, उसका एक निश्चित भाग सुरक्षा कोष में रखकर, शेष राशि व्यापारियों व उद्यमियों को उत्पादक कार्यों के लिए उधार दे देता है और उस पर ब्याज कमाता है। वास्तव में बैंक की आय का यही मुख्य स्त्रोत है। बैंक निम्नलिखित रूपों में ऋण तथा अग्रिम प्रदान करता है। बैंक ऋण निम्नलिखित रूपों में दिया जा सकता है. (i) नकद साख (ii) मांग उधार
(iii) अल्पावधि ऋण
(iv) ओवर ड्राफ्ट
(v) विनिमय बिलों पर कटौती
3. एजेंसी कार्य-बैंक अपने ग्राहकों का एजेंट के रूप में भी काम करता है जिसके लिए बैंक कुछ कमीशन लेता है। बैंक द्वारा प्रदत्त एजेंसी सेवाएँ निम्नलिखित हैं|
(i) नकद कोषों का हस्तांतरण-बैंक-ड्राफ्ट उधारे खाते की चिट्ठी तथा अन्य साख-पत्रों द्वारा बैंक एक स्थान से दूसरे स्थान को रकम का स्थानांतरण करता हैं ये सेवा कम लागत, शीघ्रता और सुरक्षायुक्त होती है।
(ii) बैंक अपने ग्राहकों के लिए कंपनियों के शेयर बेचता और खरीदता है। यह कंपनियों के नाम पर हिस्सेदारी में लाभ को बाँटता है।
(iii) नकद संग्रह करना-बैंक अपने ग्राहकों के लिए उनके आदेश पर चेक, धनादेश, हुंडियों आदि की रकम उनके दाताओं से वसूल करता है।
(iv) ग्राहकों को आयकर संबंधी परामर्श देता है और उनके आयकर का भुगतान करता है।
4. सामान्य उपयोगी सेवाएँ-बैंक द्वारा उपलब्ध अन्य उपयोगी सेवाएँ निम्नलिखित हैं
(i) बैंक, विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करता है।
(ii) कीमती वस्तुएँ जैसे-जेवरात, सोना, चाँदी, कागज पत्रों को सुरक्षित रखने के लिए लाकर्स उपलब्ध करता है।
(iii) पर्यटक चेक और उपहार चेक जारी करता है।

प्र० 11. मुद्रा गुणक क्या है? इसका मूल्य आप कैसे निर्धारित करेंगें? मुद्रा गुणक के मूल्य के निर्धारण में किस अनुपातों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है?
उत्तर:


प्र० 12. भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के उपकरण कौन-कौन से हैं? बाह्य आघातों के विरुद्ध भारतीय रिजर्व बैंक किस प्रकार मुद्रा की पूर्ति को स्थिर करता है?
उत्तर: केन्द्रीय बैंक/भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के उपकरणों को दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है
1. मात्रात्मक उपकरण
2. गुणात्मक उपकरण
मात्रात्मक उपकरण साख की कुल मात्रा को प्रभावित करते हैं अर्थात् ये साख की कुल मात्रा को बढ़ाते अथवा घटाते हैं जबकि गुणात्मक उपकरण साख की दिशा को प्रभावित करते हैं। यदि अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी दबाव है तो साख को संकुचित किया जाता है और यदि अर्थव्यवस्था में आर्थिक मंदी/अपस्फीतिकारी दबाव है तो साख का विस्तार किया जाता हैं मात्रात्मक उपायों द्वारा साख, को अनुत्पादक उद्देश्यों से कम करके उत्पादक उद्देश्यों के लिए बढ़ाया जाता है।

इसे विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया गया है
1. मात्रात्मक उपकरण-मात्रात्मक उपकरण मौद्रिक नीति के वे उपकरण हैं जो साख की उपलब्ध कुल मात्रा को प्रभावित करते हैं। ये इस प्रकार हैं
(i) बैंक दर – बैंक दर से अभिप्राय उस ब्याज दर से है जिस पर केन्द्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को। अल्पकालीन ऋण देता है। इसे रेपो दर (Repo Rate) भी कहते हैं। यदि अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी दबाव है तो बैंक दर को बढ़ा दिया जाता है, क्योंकि बैंक दर बढ़ने पर वाणिज्यिक बैंक भी ऋणों की ब्याज दर बढ़ा देते हैं और बाजार में साख की माँग कम हो जाती है। दूसरी ओर आर्थिक मंदी के समय भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंक दर कम कर दी जाती है इससे ब्याज पर कम हो जाती है और साख की माँग बढ़ जाती है।
(ii) खुले बाजार की क्रियाएँ – जब भारतीय रिजर्व बैंक सरकारी प्रतिभूतियों को खुले बाजार में बेचता और खरीदता है तो इसे खुले बाजार की क्रियाएँ कहा जाता है। जब अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी दबाव होता है तो भारतीय रिजर्व बैंक प्रतिभूतियाँ बेचता है जिससे वाणिज्यिक बैंकों से वह उतनी नकद राशि खींच लेता है और उनकी ऋण देने की क्षमता कम हो जाती है। इस प्रकार केन्द्रीय बैंक साख की उपलबता को नियंत्रित करता है दूसरी ओर जब अर्थव्यवस्था में आर्थिक मंदी होती है तो वह प्रतिभूतियाँ खरीदता है, जिससे वाणिज्यिक बैंक की ऋण देने की क्षमता बढ़ जाती है, क्योंकि उसके
पास उपलब्ध नकद राशि बढ़ जाती है।
(iii) नकद आरक्षित अनुमान (CRR) – प्रत्येक वाणिज्यिक बैंक को अपनी जमाओं का एक न्यूनतम प्रतिशत कानूनी तौर पर केन्द्रीय बैंक के पास रखना पड़ता है। यह दर केंद्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है। जब अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी दबाव होता है तो इस अनुपात को बढ़ा दिया जाता

अतः इसके बढ़ने से बैंक की साख निर्माण क्षमता कम हो जाती है। इसके विपरीत आर्थिक मंदी के समय CRR को कम कर दिया जाता है।
जिससे बैंक की साख निर्माण क्षमता बढ़ जाती है।
(iv) सांविधिक तरलता अनुपात (SCR)-सांविधिक तरलता अनुपात से तात्पर्य वाणिज्यिक बैंकों की तरल परिसंपत्तियों से है जो उन्हें अपनी कुल जमाओं के एक न्यूनतम प्रतिशत के रूप में दैनिक आधार पर अपने पास रखनी होती है, ताकि वे अपने जमाकर्ताओं की नकद माँग को पूरा कर सकें। CRR की भाँति SLR में भी स्फीतिकारी दबाव की स्थिति में वृद्धि की जाती है, ताकि बैंक की साख निर्माण क्षमता कम हो जाए।
2. गुणात्मक उपकरण-ये साख निर्माण के वे उपकरण हैं जो साख की मात्रा को प्रभावित नहीं करते बल्कि साख के प्रवाह को किसी विशेष क्षेत्र की ओर निर्दिष्ट करते हैं। ये मुख्यतः तीन प्रकार के हैं जिनका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है
(i) सीमांत आवश्यकता – ऋणों की सीमान्त आवश्यकता से तात्पर्य बैंक द्वारा दिए गए ऋण तथा गिरवी रखी गई वस्तु के वर्तमान मूल्य से है। सामान्यतः कोई व्यक्ति जितने मूल्य की वस्तु जमानत के तौर पर बैंक के पास रखता है, बैंक उससे कम का ऋण देता है। इस अन्तर को रखने का उद्देश्य यह होता है कि वस्तु के मूल्य में कमी होने पर बैंक को नुकसान न हो आदि। करोड़ की प्रतिभूतियों पर बैंक 80 लाख ऋण देता है तो सीमांत आवश्यकता 20% है और यदि वह 60 लाख का ऋण देता है तो सीमांत आवश्यकता 40% है। सीमान्त आवश्यकता बढ़ने पर उधारकर्ता की ऋण लेने की क्षमता कम हो जाती है तथा इसके विपरीत रिजर्व बैंक जिस क्षेत्र में ऋण की उपलब्धता बढ़ाना चाहता है उस क्षेत्र के ऋणों के लिए सीमान्त आवश्यकता कम कर देगा जैसे 1 करोड़ की प्रतिभूतियों पर शिक्षा ऋण 90 लाख तक का भी दिया जा सकता है। इस प्रकार यह साख के प्रवाह को एक विशेष दिशा प्रदान करता है।
(ii) साख की राशनिंग-साख की राशनिंग से तात्पर्य विभिन्न वाणिज्यिक क्रियाओं के लिए साख की मात्रा का कोटा निर्धारण करना है। ऋण देते समय वाणिज्यिक बैंक किसी विशेष क्षेत्र को कोटे की
सीमा से अधिक ऋण नहीं दे सकते।
(iii) नैतिक प्रभाव-कभी-कभी केन्द्रीय बैंक सदस्य बैंकों पर नैतिक प्रभाव डालकर उन्हें साख नियंत्रण के लिए अपनी नई नीति के अनुसार काम करने के लिए सहमत कर लेते हैं। केन्द्रीय बैंक का लगभग सभी वाणिज्यिक बैंकों पर नैतिक प्रभाव है। बाहरी आघातों के विरुद्ध भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा पूर्ति का स्थिरीकरण-बाह्य आघातों के विरुद्ध भारतीय रिजर्व बैंक स्थिरीकरण के द्वारा मुद्रा की पूर्ति को स्थिर करता है। स्थिरीकरण का अर्थ है भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी विनिमय अंत:प्रवाह में वृद्धि के विरुद्ध मुद्रा की पूर्ति को स्थायी रखने के लिए किये गए हस्तक्षेप से है। स्थिरीकरण के अन्तर्गत भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी विनिमय की मात्रा के बराबर की मात्रा में सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री खुले बाजार में करता है। जिससे अर्थव्यवस्था में कुल मुद्रा अप्रभावित रहती है।

प्र० 13. क्या आप ऐसा मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक बैंक ही ‘मुद्रा का निर्माण करते हैं?
उत्तर: हाँ, वाणिज्यिक बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। वे अपने द्वारा दिए गए ऋणों से संबंधित माँग जमाओं के रूप में साख का सृजन करते हैं। वाणिज्यिक बैंकों की माँग जमाएँ उनके नकद कोषों से कई गुणा अधिक होती है। यदि यह मान लें कि उनके नकद कोषों की राशि के 1000 है तथा माँग जमाएँ ₹ 10,000 है, तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति वाणिज्यिक बैंकों के नकद कोषों से दस गुणा अधिक हो जाएगी। इसी प्रकार नकद कोषों के ₹ 1,000 के आधार पर वाणिज्यिक बैंकों ने मुद्रा की पूर्ति में ₹ 10,000 का योगदान दिया।

प्र० 14. भारतीय रिज़र्व बैंक की किस भूमिका को अंतिम ऋणदाता कहा जाता है?
उत्तर: अंतिम ऋणदाता के रूप में केंद्रीय बैंक वित्तीय संकट के दौरान वाणिज्यिक बैंकों के लिए गारंटीकर्ता के रूप में तैयार होता है। वाणिज्यिक बैंक अपनी जमाओं को सामूहिक रूप से तुरंत निकलवाने के लिए तत्पर रहने वाले जमाकर्ताओं का विश्वास खो सकते हैं, चूंकि वाणिज्यिक बैंकों के नकद कोष उनकी माँग जमाओं का एक छोटा-सा भाग होते हैं, कोष बाहर जा सकते हैं, जिसके कारण बैंक में वित्तीय संकट आ जाता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक ही होता * है जो वाणिज्यिक बैंक के लिए गारंटीकर्ता की भांति तैयार रहता है तथा उसे दिवालियापन से बचाता है।

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